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साहिबगंज का इतिहास


साहेबगंज जिला का इतिहास काफी समरूद्ध एवं रोचक रहा है। जिले का इतिहास मुखयतः राजमहल शहर के उपर केन्द्रीत है। साहेबगंज जिले की एतिहासिक घटनाऐं मूलतः संथाल परगना जिला मुखयतः गोड्डा, दुमका, देवघर एवं पाकुड़ से ही संबंधित है।

   1854-55 में सिदो-कानू बन्धुओं के नेतृत्व में हुए महान क्रांति के बाद भागलपुर जो वर्तमान में बिहार में है और वीरभूम जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल में है, जिले के भूभागों को मिलाकर संथाल परगना का पृथक जिला गठन किया गया था। संथाल परगना का सम्पूर्ण जिला वर्तमान के हजारीबाग, मुंगेर तथा भागलपुर इलाके को मिलाकर अंग्रेजों द्वारा जंगल तराई के रूप में जाना जाता था तथा सन्‌ 1763 में साहा आलम से इलाहाबाद संधी के पश्चात दिवानी के रूप में अंग्रेजों द्वारा प्राप्त किया गया।

पूर्व इतिहासः-
   
  मल पहाड़िया जिन्हें मलर के रूप में जाना जाता था, वे इस इलाके में प्रथमवासी माने जाते हैं। आज भी इस आदिम जाति के लोग इस इलाके में रहते हैं। सेल्यूकस निकेटर के ग्रिकदूत जो 302 ठब् में इस इलाके में आये थे, उनके द्वारा मरान्डी के रूप में संभवतः इन्ही पहाड़ी व्यक्तियों को संबोधित किया है। चीनी प्रवासी हुएनत्संग के सन्‌ 645 ।क् में इस इलाके में आने तक इस भाग का इतिहास अज्ञात रहा। सम्भवतः तेलियागड़ी किले को देखकर उनके द्वारा गंगा नदी के किनारे पर ईंट और पत्थरों से बना हुआ बुद्ध मीनार कहा गया था।

मध्यकालीन इतिहास :-
13 वीं सदी में मुगल सेनाओं के बंगाल प्रान्त में आने के पश्चात से इस भाग का सम्पूर्ण इतिहास उपलब्ध है। मलिक इखितयार उद्यीन वीन बखितयार खिलजी बंगाल और आसाम पर कब्जा करने के लिए तेलियागढ़ी घाटी से गुजरे थे। उन्होंने बिहार पर कब्जा कर लिया तथा राजा लक्ष्मण सेना को बिहार भागना पड़ा। सन 1538 में शेरशाह सुरी द्वारा तेलियागढ़ी के निकट किला बनाया गया। 12.07.1576 में राजमहल की लड़ाई के बाद बंगाल प्रान्त में मुगल साम्राज्य की नींव डाली गयी। सम्राट अकबर के सेनापति मानसिंह के द्वारा 1592 में राजमहल को बंगाल की राजधानी बनाया गया। शेरसाह सुरी द्वारा राजमहल को अपनी राजधानी बनाने की कोशिश की गयी थी, किन्तु मानसिंह द्वारा उनका सपना पूर्ण किया गया। मानसिंह द्वारा राजमहल में किला तथा महल बनाया गया, किन्तु राजमहल का यह सम्मान ज्यादा दिन नहीं टिक सका और सन 1608 में राजधानी को राजमहल से ढाका स्थानान्तरित कर दिया गया। इसके पश्चात इस इलाके में शाहजहॉं और इब्राहिम खान, जो बंगाल के सुबेदार थे उनके बीच काफी लड़ाईयां हुई, जिसमें शाहजहॉँ बिजयी हुए और बंगाल प्रान्त उनके कब्जे में आ गया।

सन्‌ 1639 में शाह सुजा जो शाहजहाँ के द्वितीय पुत्र थे, उनके द्वारा राजमहल को पुनः बंगाल की राजधानी बनाया गया। मुगल सल्तनत के सुबेदारी शहर के रूप में राजमहल सन 1660 तक कार्यरत रहा। राजमहल में सिक्के बनाने की टंकसाल अवस्थित थी। ऐसा कहा जाता है कि शाह सुजा के बेटी का डा0 बौटन द्वारा राजमहल में ही ईलाज किया गया था। इसके बाद ही डा0 बौटन को शाह सुजा के द्वारा बंगाल में व्यापार करने की अनुमति दी गयी थीं, इस तरह अंग्रेजी हुकूमत की शुरूआत यहीं से हुई थी। सन 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद भागे हुए सिराजउददौला को इसी इलाके में अंग्रेजों द्वारा पकड़ा गया था।

अंग्रेजी शासनः- -

पलासी की लड़ाई में विजय के पश्चात साहेबगंज जिला बंगाल प्रान्त के साथ अंग्रेजों के कब्जे में आ गया, किन्तु संथाल परगना इलाके में अंग्रेजों को पहाड़िया लोगों का कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। पहाड़िया समुदाय के लोग स्वतंत्रता के प्रेमी थे तथा किसी परिस्थिति में दूसरे की गुलामी मानने को तैयार नहीं थे। इस स्थिति को देखते हुए गवर्नर जेनरल वारेन हेस्टिंग द्वारा 1772 में पहाड़िया समुदाय को नियंत्रित करने के लिए कैप्टन ब्रुक के नेतृत्व में 800 सैनिकों का एक विशेष दल गठित किया गया। इस दल को कुछ हद तक कामयावी मिली। उनके पश्चात आये कैप्टन जेम्स ब्राउन के द्वारा पहाड़िया समुदाय को संतुष्ट करने के लिए सन 1774 में एक योजना बनायी गयी। इस योजना को उनके पश्चात ऑंगस्टस क्लेवेलैड के द्वारा कार्यान्वित किया गया। इस योजना के तहत पहाड़िया लोगों की समस्यायें तथा विवाद सुलझाने के लिए प्रधानों की एक समिति गठित की गयी। सन 1796 में अध्यादेश के द्वारा इस समिति को कानूनी बैघता दी गयी तथा प्रत्येक दंडाधिकारी को यह आदेश दिया गया कि पहाड़िया समुदाय से संबंधित सभी विवादों को उक्त समिति के द्वारा ही सुलझाया जाय। दंडाधिकारी समिति के बैठक में उपस्थित रहते थे तथा उन्हें सजा सुनाने का अथवा सजा में बदलाव करने का अधिकार दिया गया। पहाड़िया समुदाय के लिए यह पद्धति सन 1827 तक चलती रही, जिसके पश्चात उन्हें भी अन्य नागरिकों की तरह सामान्य अदालतों के दायरे में लिया गया। किन्तु तब भी छोटे मसलों को सुलझाने के अधिकार प्रधानों की समिति के पास कायम रखे गये।

भागलपुर के संयुक्त दंडाधिकारी नियुक्त होने के पश्चात जे. सुदरलैंड द्वारा संथाल परगना जिला में आदिवासियों की समस्याओं को देखते हुए सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र को सरकार की सम्पत्ति घोषित करने हेतु सुझाव दिया गया ताकि उसका रख-रखाव वेहतर ढंग से किया जा सके। इसी सुझाव के क्रम में 1824 में जॉंन पेटी वार्ड के द्वारा सरकारी सम्पत्ति के सीमांकन हेतु कार्य प्रारम्भ किया गया और इस सीमांकित प्रदेश को द्रदामिन ई-कोहच्च् कहा गया। इस पार्शियन शब्द का अर्थ द्रैापतजे वि ीपससेच्च् होता है। सन 1837 में यह कार्य पूर्ण हुआ तथा श्री पॉंन्टेट को दामिन इलाके के प्रशासन के रूप में नियुक्त किया गया। इसी के दौरान यहॉं के आदिवासी समुदाय के लोग जंगल काटकर गुजर वसर कर रहे थे, उनके मन के असंतोष ना समझते हुए प्रशासन तथा अन्य व्यक्तियों के द्वारा आदिवासियों का लगातार शोषण चल रहा था।

संथालों की क्रांति- 1855 :--

सन 1790 से 1810 तक बीरभूम, बाबुरा, हजारीबाग एवं रोहतास जिले से स्थानान्तरित होकर संथाल समुदाय के लोग संथाल परगना में आये थे। विलियम डब्लू हन्टर के अनुसार 1790 में कायम वन्दोवस्ती के बाद खेती के इलाके में काफी बढ़त हुई। संथाल लोग के जमीन को जंगली जानवरों से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इस जिले में बसने वाले संथाल काफी मेहनती और सीधे इन्सान थे। अतः व्यापारियों द्वारा तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा उन्हें आसानी से फंसा लिया जाता था। पी0 सी0 राय तथा चौधरी के द्वारा लिखित इतिहास के अनुसार बनिया और महाजन के द्वारा संथाल लोगों का काफी शोषण किया गया और प्रशासन ने इसके उपर कोई कार्रवाई नहीं की। संथाल समुदाय के लोगों को सामाजिक तौर पर तथा वगैर किसी कीमत के न्याय मिलने की परम्परा थी। किन्तु भ्रष्ट पुलिस और प्रशासन के कारण उन्हें उचित न्याय नहीं मिल रहा था। साधारण से विवाद के लिए भी उन्हें मुर्शिदावाद जिले के जंगीपुर अथवा भागलपुर जाना पड़ता था, जिसमें काफी राशि खर्च होती थी। इसके अतिरिक्त इन अदालतों में भी संथालों का शोषण होता था।
इसी तरह द्रकमौतीच्च् प्रथा के अन्तर्गत लिये गये ऋण को शारिरीक परिश्रम द्वारा चुकाने का प्रावधान था। किन्तु असल में कर्जदार सदियों तक परिश्रम करता रहता था। इन सब कारणें से संथाल लोग असुरक्षित हो गये थे तथा असंतोष काफी बढ़ गया था, जिसकी परिणति 1855 के संथाल हुल में हुई। साहेबगंज जिले में बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह ग्राम के सिदो, कान्हू, चॉंद और भैरव बन्धुओं द्वारा इस हुल का नेतृत्व किया गया। उसी तरह चान्द्राय और सिंगराय भी इस आन्दोलन के प्रमुख थे। सिदो को अंग्रेजों द्वारा पकड़कर बरहेट के नजदीक पंचकठिया में फाँसी दी जबकि कानू अंग्रेजों से मुठभेड़ में मारे गये।
संथाल हुल का मुखय उद्‌ेश्य संथाल लोगों को महाजन के चंगुल से मुक्त करना था। इस आन्दोलन की शुरूआत लिट्टीपाड़ा में हुआ, जहॉं महाजन के साथ झगड़ा करने के बाद बाइजाई मांझी को पकड़कर भागलपुर जेल भेजा गया। वहाँं किसी सुनवाई के वगैर ही उनकी मृत्यु हो गयी। उनके पुत्र सिंगराय द्वारा इसका विरोध किया गया तो उन्हें बरहेट बाजार में ही फाँसी दे दिया गया। इस वजह से संथाल समुदाय में व्याप्त रोष स्वतंत्रता आन्दोलन के बीज के रूप में उभरकर सामने आया। अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा इसे हुकूमत के खिलाफ बगावत मानते हुए अपनी सेनाओं के साथ संथाल लोगों पर अत्याचार प्रारम्भ कर दिया गया। जिसके वजह से यह आन्दोलन आस-पास के कई जिलों में भी फैल गया। नवम्बर 1855 में मार्शल लॉं लागू किया गया तथा दिसम्बर, 1855 में अंततः अंग्रेजी हुकूमत द्वारा इस आन्दोलन को कुचल दिया गया।
आन्दोलन के दौरान संथालों के द्वारा दिखाये गये असीम धैर्य और साहस से अंग्रेजी हुकूमत भी प्रभावित हुई तथा संथालों की मांगों के उपर सम्यक विचार किया गया। इसके पश्चात 1855 के नियम ग्ग्ग्टप्प् के तहत अलग संथाल परगना जिला का गठन किया गया।
संथाल हुल के बाद 1857 में पुनः अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध लड़ने के लिए संथाल लोग तैयार नहीं थे। रोहिनी में अवस्थित पांचवीं वाहिनी के सैनिकों द्वारा तथा भागलपुर के सैनिकों द्वारा आन्दोलन में अंग्रेजी अधिकारियों के विरूद्ध मोर्चा खोला गया, किन्तु वह समय पर ही कुचल दिया गया। इस तरह स्वतंत्रता के प्रथम युद्ध में इस जिले में कोई विशेष घटना नहीं घटी।

स्वतंत्रता संग्रामः-
पूरे भारत की तरह संथाल परगना जिले में भी स्वतंत्रता संग्राम का असर देखा गया तथा साईमन कमिशन का वहिष्कार और नमक सत्याग्रह में नागरिकों ने बढ़-चढ़़ कर हिस्सा लिया। लम्बोदर मुखर्जी नामक देश भक्त के द्वारा संथाल परगना के जंगलों में घुमकर संथाल लोगों को जागृत करने का कार्य किया गया। 1942 के क्रांति में भी इस जिले में हड़ताल और जुलूस आयोजित किया गया और अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जनता के उपर अत्याचार की भी घटना हुई। इस प्रकार साहेबगंज और संथाल परगना के अन्य जिले स्वतंत्रता की युद्ध में पूरे देश के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते रहे।

1947 के पश्चात्‌ :-
स्वतंत्रता के पश्चात आदिवासियों की उन्नति के लिए संविधान की 5 वें सदी में इस इलाके को रखा गया है। उसके वावजूद आदिवासियों का शोषण चलता रहा और पृथक झारखंड राज्य के गठन की मांग होती रही। काफी संघर्ष के पश्चात अन्ततः 15 नवम्बर,2000 में छोटानागपुर और संथाल परगना के 18 जिलों को मिलाकर अलग झारखंड राज्य का गठन किया गया।